महात्मा गांधी

महात्मा गांधी

नाममोहनदास करमचंद गांधी

जन्म- 2 अक्टूबर 1869 गुजरात के पोरबंदर में

पिता-करमचंद गांधी

माता-पुतलीबाई

  • 1888 में बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड गए।
  • 1891 में बैरिस्टर की पढ़ाई पूरी कर भारत आए ।
  • 1893 दक्षिण अफ्रीका ,  एक केस के सिलसिले में गए।
  • 9 जनवरी 1915 को भारत आए।

महात्मा गांधी की किताबें

  • सत्य के प्रयोग, 1927 में
  • हिंद स्वराज,  1919 , हिंदी में
  • दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह, अंग्रेजी में
  • मेरे सपनों का भारत
  • ग्राम स्वराज

महात्मा गांधी के प्रमुख समाचार पत्र पत्रिकाएं

  • इंडियन ओपिनियन
  • यंग इंडिया
  • हरिजन
  • नवजीवन

गांधी जी द्वारा स्थापित प्रमुख संस्थाएं

  • फिनिक्स पार्क ,1904
  • टॉलस्टॉय पार्क, 1906
  • वर्धा आश्रम
  • साबरमती आश्रम,  1917

महात्मा गांधीजी के विचार

  • नैतिक विचार
  • सामाजिक विचार
  • राजनीतिक विचार
  • धार्मिक विचार
  • आर्थिक विचार

नैतिक विचार

गांधी जी के विचारों को “व्यावहारिक आदर्शवाद” कहा जाता है , व्यावहारिक आदर्शवाद का अर्थ है आदर्शों को जीवन में उतारना,  गांधी जी का संपूर्ण जीवन हमें इस बात की प्रेरणा देता है यह आदर्शों को जीवन में कैसे उतारा जाए आदर्शों एवं जीवन के मध्य सामंजस्य कैसे स्थापित किया जाए।

पंचव्रत का सिद्धांत

  • अहिंसा
  • सत्य
  • अस्तेय
  • अपरिग्रह
  • ब्रम्हचर्य

अहिंसा:

गांधीजी के अनुसार अहिंसा सर्वोत्तम सद्गुण है अहिंसा के दो पक्ष हैं।

  • सीमित पक्ष या निषेधात्मक पक्ष:

मन, वचन, कर्म से किसी भी प्राणी को कष्ट न पहुंचाना और कष्ट पहुंचाने का विचार भी ना लाना।

  • व्यापक या भावनात्मक पक्ष:

सभी प्राणियों के प्रति प्रेम , दया,  सहानुभूति और सेवा भाव रखना शामिल है।

महात्मा गांधी जी की अहिंसा “इशावस्यमिद सर्वं “के विचार पर आधारित है जिसका अर्थ है जगत के कण-कण में ईश्वर की उपस्थिति है ईश्वर यह अलग-अलग तरीके से विभिन्न मनुष्य, पेड़ पौधों एवं अन्य प्राणियों में व्याप्त है किसी भी प्राणी या जीव के प्रति हिंसा करने का अर्थ है ईश्वर के प्रति संदेह व्यक्त करना अत: अहिंसा ईश्वर में अभिव्यक्ति निष्ठा का एक माध्यम है

गांधी जी की अहिंसा जैनों की अहिंसा की तुलना में लचीली एवं व्यावहारिक है उन्होंने स्वयं स्पष्ट किया है कि किन परिस्थितियों में अहिंसा के नियम का उल्लंघन किया जाना उचित है

  • हिंसक पशुओं,  रोगों के कीटाणु,  फसल नष्ट करने वाले कीटों की हत्या करना उचित है लेकिन यह केवल समाज के हित के लिए हो।
  • असहनीय दर्द झेल रहे ,प्राणी की मुक्ति यदि कोई रास्ता ना हो तो उसके जीवन को समाप्त कर देना उचित है।
  • चिकित्सक द्वारा शल्य चिकित्सा के लिए की जाने वाली हिंसा उचित है।
  • अगर हिंसा और कायरता में से चुनना हो तो हिंसा करना उचित है।
  • किसी प्राणी के नैतिक आध्यात्मिक  विकास के लिए उसे कष्ट पहुंचाना अहिंसा का उल्लंघन नहीं है,  जैसे स्कूल में विद्यार्थी को दंड दिया जाना।

इस प्रकार कहा जा सकता है कि अहिंसा एक सर्वोत्तम गुण है।

सत्य:

गांधी जी ने सत्य को दो अर्थो में परिभाषित किया है सीमित और व्यापक

  • व्यापक अर्थ में

सत्य और ईश्वर समानार्थी सत्य में निष्ठा रखते हुए नैतिक जीवन जीना सत्य है।  इसके अंतर्गत उन्होंने सत्य को ईश्वर से अधिक महत्व दिया है इसका कारण है कि ईश्वर में संदेह हो सकता है ,परंतु सत्य के प्रति कोई भी संदेह व्यक्त नहीं किया जा सकता है।

  • सीमित दृष्टिकोण

इसे हम मूल्य के रूप में स्वीकार करते हैं इसके अनुसार सत्य बोलने का अर्थ वही है जो तत्व जिस रूप में देखा, सुना जाता है या अनुभव किया जाता है उसे उसी रूप में बिना किसी परिवर्तन व संशोधन के व्यक्त करना ही सत्य है।

सत्य के मार्ग पर चलना कठिन है किंतु जरूरी है कठिन इसलिए है क्योंकि यह अत्यंत साहस की मांग करता है और जरूरी इसलिए है क्योंकि नैतिक रुप से सही संबंध के आधार पर स्थापित किए जा सकते हैं।

गांधी जी द्वारा सत्य के मार्ग पर चलने के उपाय

  • अनावश्यक अभी व्यक्तियों से बचना।
  • तथ्यों से छेड़छाड़ तथा अतिशयोक्ति जैसे प्रयासों से दूर रहना।
  • कष्ट ,निंदा ,क्रोध झेलने की क्षमता का विकास करना चाहिए क्योंकि सत्य बोलने पर यह परिणाम स्वभाविक रूप से होते हैं।
  • अनावश्यक दार्शनिकों के उलझन में फंसने के बजाय अपनी सामान्य सूझबूझ से सत्य का आचरण करना चाहिए।
  • सत्य की दृढ़ता पूर्वक पालन करना चाहिए एवं व्यवहारिक जीवन में समस्याओं का समाधान करना चाहिए।

अस्तेय:

अस्तेय का सामान्य अर्थ-  चोरी ना करना , परंतु गांधीजी ने इसे व्यापक अर्थों में लिया है उनके लिए अस्तेय का अर्थ है किसी को ऐसी वस्तु से वंचित ना करना जिस पर उसका अधिकार हो गांधीजी के अनुसार चोरी तीन प्रकार की हो सकती है

  • पहली-  शारीरिक या भौतिक चोरी इसमें किसी व्यक्ति के धन, संपत्ति या वस्तु को चुराया जाता है
  • दूसरी – मानसिक चोरी किसी वस्तु को चुराने की भावना मन में लाना।
  •  तीसरी – वैचारिक चोरी-  किसी अन्य के विचारों को अपना बताकर व्यक्त करना।

अपरिग्रह:

अपरिग्रह का सामान्य अर्थ है धन संचय ना करना,  किंतु गांधी जी का इसमें व्यापक अर्थ लेते हुए उनके अनुसार निरंतर श्रम करते हुए समाज से कुछ लेना एवं बिना श्रम किए किसी चीज पर हक ना जताना जीवन की अनिवार्यताओं के अलावा जो कुछ भी है उसका प्रयोग समाज के हित में करना यही ट्रस्टीशिप का सिद्धांत है इसका अर्थ है धन पूंजीपतियों से छीनने की आवश्यकता नहीं है बल्कि उनका हृदय परिवर्तन करना चाहिए ताकि वह समझ सके कि अपनी जरूरत भर के साधनों का खर्च करने के बाद उसे से सारा धन जरूरतमंदों के लिए खर्च करना चाहिए।

मार्क्स और गांधीजी के विचारों में अंतर:

  • ट्रस्टीशिप यह न्याय सीता के सिद्धांत में गांधीजी और मार्क्स के विचार में बहुत अंतर है भौतिकवादी होने के कारण मार्क्स हृदय परिवर्तन को संभव नहीं मानते हैं उनका दावा है कि समानता लाने का एकमात्र तरीका है अमीरों की संपत्ति छीन ना और संपूर्ण संपत्ति सामाजिक घोषित कर देना
  • गांधीजी के विचार हैं कि धन कमाना एक विशिष्ट कार्य है,  जो वही व्यक्ति कर सकता है जिसका स्वधर्म ऐसा हो,  व्यक्ति को धन कमाने का मौका मिलना चाहिए क्योंकि इसे सामाजिक संसाधन भरते हैं किंतु उन्हें महसूस करना चाहिए कि संसाधन उनके नहीं है समाज के हैं क्योंकि गांधी जी आदर्शवाद एवं प्रत्यय वादी हैं इसलिए मैं हृदय परिवर्तन की धारणा को स्वीकार करते हैं।

ब्रम्हचर्य:

  • गांधीजी के अनुसार सामान्य अर्थ मन ,वचन ,कर्म से इंद्रियों पर संयम रखना परंतु व्यापक अर्थ में ब्रम्हचर्य का अर्थ ब्रह्मा की सत्य की साधना में चर्या अर्थात ब्रह्मचर्य आचरण है जो बर्मा की खोज के लिए किया जाए अर्थात व्यक्ति को प्रतिदिन नैतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान के लिए प्रयास करना चाहिए।

गांधी जी के विचारों की वर्तमान प्रसंगिकता

  • अपरिग्रह से समतामूलक समाज की स्थापना
  • अहिंसा से पर्यावरण संरक्षण इन विलुप्त प्राय जीवों को बचाया जा सकता है
  • विभिन्न धर्म वर्ग जाति को ईश्वर की अभिव्यक्ति मानते हुए पूर्वाग्रह को खत्म किया जा सकता है।
  • समाज में न्याय की स्थापना की जा सकती।
  • समाज में गरीबी ,बेरोजगारी की समस्याओं को हल किया जा सकता है।
  • अहिंसक आंदोलनों की रूपरेखा रखी जा सकती है।
  • नक्सलवाद, आतंकवाद को खत्म किया जा सकता है।
  • व्यक्ति को उसके अधिकारों को समुचित रूप से क्रियान्वित किया जा सकता है।

सत्याग्रह:

सत्याग्रह का अर्थ है सत्य का आग्रह करना , गांधी जी ने अत्याचार ,अहिंसा , अन्याय का सामना करने के लिए अहिंसा ,सत्य पर आधारित जिस नियम को सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में अपनाया उसी का नाम सत्याग्रह है।

  • अवधारणा

गांधीजी का मानना था कि मनुष्य वस्तुत: अच्छाई से युक्त उसमें ईश्वर का अंश है। उसमें अशुभ या बुराई मात्र से में इसलिए है क्योंकि वह व्यक्ति, क्रोध ,लोभ ,मोह से ग्रस्त है आवश्यकता इस बात की है कि उस व्यक्ति के अंदर अच्छाइयों को उभारा जाए जिससे वह स्वयं क्रोध लोभ मोह से मुक्त होकर सत्य को सत्य के रूप से में समझ सके एवं अपनी कमियों को कमियों के प्रति सचेत हो सके

 गांधीजी के अनुसार सत्याग्रह का पालन वही व्यक्ति कर सकता है जो व्यक्ति हिंसा की भावना को दमित कर दिया हो, सत्य के लिए सत्याग्रही स्वयं कष्ट झेलता है एवं अपने विरोधी को बाध्य करता है कि वह सत्य को समझें।

सत्याग्रह परिवर्तन लाने के लिए  एक अहिंसा सामूहिक आंदोलन है।

गांधी जी ने सत्याग्रह के हथियार का प्रयोग ना सिर्फ भारतीय स्वतंत्रता के लिए किया बल्कि समाज में फैली कुरीतियों जैसे जाति प्रथा ,अस्पृश्यता आदि के लिए भी किया गांधी जी ने कहा था कि सत्याग्रह मुख्य रूप से एक धार्मिक आंदोलन है , उनका कहना था कि समाज के लिए प्रयोग होना चाहिए व्यक्तिगत लाभ या स्वार्थ के लिए नहीं होना चाहिए।

सत्याग्रह की विशेषताएं:

  • सत्याग्रही को अपने उद्देश्य के प्रति ईमानदार होना चाहिए।
  • सत्याग्रही खुले दिमाग या सहृदय होना चाहिए हृदय परिवर्तन तभी संभव है।
  • सत्याग्रही में विनम्रता होना चाहिए।
  • सत्याग्रही को मन वचन कर्म से अहिंसक होना चाहिए।
  • विचारों एवं कर्मों में समानता होनी चाहिए।
  • सत्याग्रही को सत्य, अहिंसा ,अस्तेय ,अपरिग्रह का पालन करना चाहिए

सत्याग्रह की विधियां:-

  • उपवास
  • असहयोग
  • बातचीत
  • निष्क्रिय विरोध
  • नागरिक अवज्ञा

साध्य और साधन की पवित्रता:

साध्य का अर्थ है अंतिम लक्ष्य वहीं साधन का अर्थ है अंतिम लक्ष्य को प्राप्ति हेतु किए जाने वाले प्रयास से

विभिन्न विचारको द्वारा पवित्र साध्य को प्राप्त करने के लिए किसी भी साधन को उचित बताया गया है

वहीं गांधी जी द्वारा इन विचारों को अस्वीकृत कर दिया गया उनका मानना है कि साध्य कितना भी पवित्र क्यों ना हो वह साधन को पवित्र नहीं बना सकता है गांधीजी के अनुसार साधन , साध्य को पवित्र बनाता है जैसा साधन होगा वैसा ही लक्ष्य प्राप्त होगा अनैतिक साधन को अपना कर कभी भी उच्च और पवित्र लक्ष्य नहीं प्राप्त किया जा सकता।,  नैतिक दृष्टि से मनुष्य के लिए उच्चतम यही है कि वह नैतिक साधनों के द्वारा ही शुभ लक्ष्य को प्राप्त कर व्यक्ति और समाज का कल्याण करें

हृदय परिवर्तन

                                                      पाप से घृणा करो पापी से नहीं

यह महात्मा गांधी जी का प्रमुख नैतिक विचार है गांधी का मानना है कि किसी भी व्यक्ति के विचार बदले जा सकते हैं अगर उसके पास उपयुक्त परिस्थिति विद्यमान हो तो गांधीजी मानते हैं कि मनुष्य ईश्वर की अभिव्यक्ति है यदि कोई व्यक्ति अनैतिक है तो उसका अर्थ केवल इतना है कि उसके अंदर का ईस्वरत्व दबा हुआ है अगर उसे सही प्रेरणा एवं परिस्थितियां मिले तो वह भीतर छुपा हुआ  ईस्वरत्व बाहर आ जाएगा और वह समाज में अपना सकारात्मक योगदान देगा ।

इसी आधार पर सम्राट अशोक को देखा जा सकता है जो कलिंग के युद्ध में की भयावहता को देख कर आंसर की ओर आगे बढ़ा तथा जन कल्याणकारी राज्य की स्थापना की विनोबा भावे द्वारा चलाया गया भूदान आंदोलन इसी का उदाहरण जैसे बड़े बड़े जमींदारों द्वारा अपनी जमीन को दान कर दिया गया इसी के द्वारा जयप्रकाश नारायण द्वारा डाकुओं का समर्पण कराया गया।

प्रकृति के प्रति सिद्धांत:

  • महात्मा गांधी के अनुसार प्रकृति ईश्वर की अभिव्यक्ति है प्रकृति एवं मानव सामंजस्य के कारण इस विश्व में शांति एवं सुख की स्थापना हुई है
  • गांधी का मानना है कि प्रकृति हमारी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा कर सकती परंतु लालच को नहीं अतः  प्राकृतिक संसाधनों का प्रयोग मानव द्वारा आवश्यकता पूर्ति हेतु करना चाहिए लालच पूर्ति हेतु नहीं एवं इसके अतिदोहन से बचना चाहिए

सामाजिक विचार

सर्वोदय:

  • सर्वोदय अर्थात सबका सभी प्रकार से उदय
  • सर्वोदय की अवधारणा गांधीजी के व्यापक दृष्टिकोण को प्रदर्शित करती है यह “सर्वभूत हितेश्या” कि भारतीय संकल्पना सुकरात के सत्य साधना , रस्किन की अंत्योदय की अवधारणा से सम्मिलित रूप से प्रेरित है सभी का सभी प्रकार से उदय,  कल्याण उत्थान से है यहां सभी से आश्य स्त्री-पुरुष , अमीर गरीब , स्वर्ण दलित आदि से है तथा सभी प्रकार से अर्थ है भौतिक,  अध्यात्मिक , आर्थिक , सामाजिक , राजनीतिक एवं नैतिक आदि इस प्रकार सर्वोदय एक ऐसी विचारधारा है जो समाज के सभी वर्गों के सभी पक्षों का कल्याण करना चाहती है यहां सर्वोदय अन्य सभी विचारधाराओं से श्रेष्ठ एवं व्यापक है
  • जहां एक और उपयोगितावाद अधिकतम लोगों के अधिकतम सुख की बात करता है नारीवाद केवल नारी के हित की बात करता है वही गांधी जी का सर्वोदय के माध्यम से सभी के हित की बात करते हैं दूसरी ओर जहां अन्य विचार धाराएं केवल भौतिक कल्याण की बात करती है वहीं गांधी जी का सर्वोदय भौतिक कल्याण के साथ साथ आध्यात्मिक कल्याण को भी स्वीकार करता है

गांधी जी के सर्वोदय के बारे में कहा जाता है कि यह व्यवस्था को प्राप्त कर पाना संभव नहीं है किंतु गांधी जी का कहना है वह तो आदर्श है उसकी अनुभूति भले ही संभव ना हो परंतु प्रेरणा का आधार तो बन ही सकती है।

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्व एवं मौलिक कर्तव्य में सर्वोदय की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।

कुछ आधारों पर सर्वोदय के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

  • प्रत्येक व्यक्ति कर्तव्य परायण हो।
  • अज्ञान एवं जागरूकता से मुक्त हो।
  • बुनियादी शिक्षा एवं अपने कार्य को करने की योग्यता हो।

 सर्वोदय की अवधारणा अहिंसा एवं सत्य पर आधारित है जो सामंजस्य बढ़ाना चाहती है।

वर्ण व्यवस्था के संदर्भ में विचार:

  • गांधीजी सामाजिक रूप से वर्ण व्यवस्था का समर्थन करते थे वह बताते थे कि वर्ण व्यवस्था मनुष्य द्वारा निर्मित नहीं है बल्कि प्रकृति अथवा ईश्वर द्वारा निर्मित है उनके अनुसार वर्ण व्यवस्था हिंदू धर्म का अनिवार्य अंग है किंतु गांधी जी जाति व्यवस्था और अस्पृश्यता को सही नहीं मानते थे उनका मानना था कि वर्ण व्यवस्था और जाति व्यवस्था दोनों ही अलग-अलग संभावनाएं हैं वर्ण एक कर्म पर आधारित संकल्पना है जबकि जाति एक जन्म पर आधारित संकल्पना है ।

गांधीजी के अनुसार वर्ण व्यवस्था के लाभ।

  • आजीविका सुनिश्चित होती है
  • अनावश्यक प्रतिस्पर्धा से बचा जा सकता है
  • पैतृक व्यवसाय को अपनाने से व्यक्ति को किसी प्रकार की प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती है।
  • पैतृक व्यवसाय अपनाने से कार्य कुशलता में वृद्धि होती है इससे आर्थिक सामाजिक विकास होता है।

गांधीजी जाति प्रथा एवं छुआछूत को पूर्णता नकारते हैं एवं सभी को बराबर मारने पर जोर देते हैं

गांधीजी के अनुसार किसी भी प्रकार के कार्य का श्रेणी क्रम करना संभव नहीं है सभी कार्य का समान महत्व है अतः उन्हें समान वेतन एवं समान लाभ मिलना चाहिए

महिला संबंधी विचार:

  • गांधी जी ने समाज में समानता पर बल दिया उनके अनुसार जितने अधिकार पुरुषों को  प्राप्त है उतने अधिकार महिलाओं को प्राप्त हो उन्हें अपना भविष्य स्वयं तय करने की एवं कार्य करने की स्वतंत्रता होनी चाहिए , इसी के संदर्भ में उन्होंने स्त्रियों को मताधिकार का समर्थन किया है दहेज प्रथा ,पर्दा प्रथा , बाल विवाह आदि का विरोध किया है।

राजनीतिक विचार

रामराज्य /स्वराज /अराजकतावाद:

  • गांधीजी ने व्यवस्थित राजनीतिक दर्शन का प्रतिपादन नहीं किया उन्होंने अपने युग अर्थात राज व्यवस्था का मूल्यांकन करके उनकी कमियों को उजागर किया तथा भारत के संदर्भ में अहिंसक राज्य का चित्रण खींचा गांधीजी के राज्य के विषय में अराजकतावाद में विश्वास करते हैं इस के संदर्भ में उनका विचार है कि अराजकता में हर व्यक्ति उच्च नैतिक स्तर पर जाएगा एवं अपना नैतिक विकास करेगा एवं उच्च नैतिक स्तर पर होने के कारण विभिन्न भूमिकाओं का निर्वहन करेगा अतः वहां प्रशासनिक तंत्र की जरूरत नहीं होगी क्योंकि वहां की व्यवस्था चलाने के लिए सामाजिक ताना-बाना ही पर्याप्त रहेगा
  • गांधीजी जानते थे कि अराजकतावाद का आदर्श उपलब्ध होना आसान नहीं है उनके द्वारा रामराज्य की  अवधारणा दी गई।

इसमें निम्नलिखित विशेषताएं थी:

  • राज्य का कार्य क्षेत्र न्यूनतम हो अर्थात सरकार वही जो कम से कम शासन करें और अधिक से अधिक स्वतंत्रता प्रदान करें।
  • शक्ति का विकेंद्रीकरण अर्थात पंचायती राज एवं स्वराज के माध्यम से सत्ता का संचालन हो
  • दलविहीन लोकतंत्र की व्यवस्था।
  • व्यक्ति की अंतरात्मा से समस्त दायित्वों का निर्वहन।

धर्म राजनीति संबंध:

  • धर्म- धारित: इति धर्म:
  • जिन गुणों को व्यक्ति को अपने जीवन में धारण करना चाहिए उसे धर्म कहते हैं जैसे – प्रेम , करुणा , इमानदारी।
  • मजहब- धर्म के गुणों तक पहुंचने का रास्ता मजहब /पंथ के कहलाता है।
  • राजनीति- लोक कल्याण के उद्देश्य से जो नीति बनाई जाए उसे राजनीति कहते हैं।

धर्म और राजनीति दोनों ही लोककल्याण की ओर अग्रसर करते हैं धर्म से तात्पर्य धारित: इति धर्म:  से है  इसके अनुसार जिन गुणों को धारण किया जाना चाहिए वह गुण धर्म कहलाते हैं,

 राजनीति से तात्पर्य लोककल्याण के लिए बनाई गई नीति अतः राजनीति का यह नैतिक उत्तरदायित्व है कि वे अपने से मुक्त होकर केवल कर्तव्य पालन के उद्देश्य से प्रशासन को चलाएं एवं समाज को अधिकाधिक लाभ प्रदान करें।  इस प्रकार धर्म तथा राजनीति दोनों का अंतिम उद्देश्य व्यक्ति तथा समाज के स्तर को बढ़ाना है अतः राजनीति एवं धर्म एक दूसरे के पूरक हैं।

आर्थिक विचार:

ट्रस्टीशिप का सिद्धांत:

  • किसी व्यक्ति को आवश्यकता से अधिक धन संचय नहीं करना चाहिए गांधी जी का ट्रस्टीशिप का  सिद्धांत अपरिग्रह सिद्धांत की व्यवहारिक अभिव्यक्ति है,  यह सिद्धांत आर्थिक , सामाजिक न्याय की स्थापना करता है।  एवं आर्थिक विषमता की समस्या का समाधान करता है ।
  • इस सिद्धांत के अनुसार गांधीजी निजी संपत्ति को मान्यता देते हैं किंतु वह कहते हैं कि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति के उतने ही भागों का उपयोग करेगा जितने कि उसे आवश्यकता है यदि किसी के पास आवश्यकता से अधिक संपत्ति है तो वह अपनी अतिरिक्त संपत्ति का केवल संरक्षक होगा जो सामाजिक हित में प्रयोग होगी गांधीजी का यह  सिद्धांत हृदय परिवर्तन पर आधारित है यह वर्ग संघर्ष के बजाय वर्ग समन्वय पर विश्वास रखता है।

कुटीर उद्योगों का समर्थन:

गांधी जी की समाज की इकाई के रूप में स्वायत्तता एवं आत्मनिर्भर ग्राम अर्थव्यवस्था के समर्थक है अतः वे लघु एवं कुटीर उद्योग का समर्थन करते थे ।

कारण :- उत्पादन एवं वितरण एवं रोजगार स्थानीय स्तर पर उपलब्धता के द्वारा आत्मनिर्भरता को बढ़ाना गांधीजी अत्यधिक औद्योगिकरण को अनुचित मानते थे उद्योगों को केवल ऐसी मशीनों का उपयोग उचित मानते थे जिनका प्रयोग मानव के हितों के लिए हो।

स्वदेशी पर बल:

गांधीजी का मानना था कि प्रत्येक व्यक्ति को स्वदेशी निर्मित वस्तुओं का प्रयोग करना चाहिए,  स्वदेशी के माध्यम से वह समानता की स्थापना करना चाहते थे। क्योंकि यदि सभी व्यक्ति स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करेंगे तो सभी का रहन सहन समान हो जाएगा,  सामाजिक विषमता खत्म हो जाएगी एवं अन्य में निर्भरता में बढ़ोतरी नहीं होगी।

गांधी जी के विचारों के प्रेरणा स्रोत:

  • जैन धर्म- पंचव्रत्त का सिद्धांत
  • बौद्ध धर्म-आत्मदीप भाव और अहिंसा , मध्यम मार्ग का सिद्धांत
  • हिंदू धर्म से- सर्वभूतहितेस्या ,मानवतावाद
  • गीता से-निष्काम कर्म
  • रस्किन -अंत्योदय
  • टॉलस्टॉय-सत्याग्रह , अराजकतावाद
  • ईसाई धर्म-करुणा
  • गोपाल कृष्ण गोखले-राजनीति

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